संकीर्ण मानसिकता

posted Sep 16, 2015, 2:54 AM by Vinod Scaria   [ updated Sep 17, 2015, 2:28 AM by SRamachandran Igib ]

भारत रत्‍न गुप्ता, वारि. तकनीकी अधिकारी.....

 

बहुत सारे माटी के दियों को देखते ही सुमन पति पर बरस पड़ीदीपावली में वैसे ही मुझे घर के काम से फुर्सत नहीं है और ऊपर से ये ढेर सारे दिये उठा लाए। अपनी इस संकीर्ण मानसिकता को त्याग दो कि ज्यादा दीपक जलाने से ज्यादा लक्ष्मी आएगी। अरेजितना किस्मत में होगा उतना ही मिलेगा। मैं आखिर कब तक मरती रहूँ?

इसपर पति ने बड़े ही शांत लहजे में उत्तर देते हुए कहाअरी भाग्यवान! क्यों बेवजह ही चीख रही हो। तुम्हारी जितनी इच्छा हो उतने ही दीपक लगानाजला लेना। मैं तो दीपक इसलिए ख़रीद लाया कि दीपक बेचने वाले के घर में आज दीपावली के दिन ज्यादा नहीं तो कम से कम दो दीपक तो जलें।

पति के मुख से निकले शब्दों को सुन सुमन को लगा कि उसके द्वारा अभी-अभी पति के लिए प्रयुक्त संकीर्ण मानसिकता शब्द अनायास ही व्यापक मानसिकता में तब्दील हो गया है। वह गुस्सा भूल कर उन माटी के दीयों को सहेजकर सुरक्षित स्थान पर रखने लगी।

मैं भारत रत्न गुप्ता जनवरी 1981 से सीएसआईआर की सेवा में हूं एवं जनवरी 2001 से वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी के पद पर कार्यरत हूं। हिन्दी भाषा से मेरा काफी लगाव है। मैने 2004 में एमएससी (कम्प्यूटर साइंस) की परीक्षा पास की है। आजकल मैं मानव संसाधन प्रभाग में संस्थान की सेवा में हूं।