काश, मैं सूरज होता !

posted Sep 16, 2015, 2:53 AM by Vinod Scaria   [ updated Sep 18, 2015, 5:08 AM by SRamachandran Igib ]

अमितेश आनन्द, शोधार्थी.....


काश, मैं सूरज होता !
तेरी हर अँधेरी रात को चीर, प्यारी सुबह लाता, 
तुम्हारी अलसाई आँखों को बड़े प्यार से खोलता । 
सुबह जब तुम अंगड़ाई लेते,
अपनी रौशनी के खजाने को तेरे आँचल में लुटा देता । 
ठंढी सुबह में, तुम्हारी हथेलियों को
अपने किरणों से सहलाता । 
तुम्हारी ज़िन्दगी के हर पन्ने को
अपनी इंद्रधनुषी रंगों से सजाता ।


काश, मैं सूरज होता !
चाहे तुम कहीं भी होते, तुम्हे अपने सामने पाता । 
बिना कुछ कहे अपने प्यार की तपिश तुम तक पहुँचा देता । 
जब तुम गुस्सा होते, मैं खुद को बादलों में छुपा लेता,
और बादलों के झरोखे से बातें कर तुम्हे मना लेता । 
जब सामने ना होता, चाँद के हाथों अपनी मद्धम रौशनी 
तुम तक भेजता । 
काश, मैं सूरज होता !


ना मन में कोई द्वेष, ना हृदय में कोई क्लेश।    मेरा ना कोई देश,मेरा ना कोई भेष।   सोच का एक पर्याय, नाम अमितेश।