Home‎ > ‎

Pulsating Thoughts of IGIBians

Pictures - Speak

posted Mar 22, 2016, 9:24 PM by SRamachandran Igib   [ updated Mar 23, 2016, 4:07 AM ]

courtesy Mitali Mukerji

Pictures-Speak

posted Dec 27, 2015, 11:22 PM by SRamachandran Igib   [ updated Dec 28, 2015, 1:45 AM ]

pictures courtsey Mitali Mukerji






मेरी ज़ुबानी महानगरों की कहानी

posted Sep 18, 2015, 5:00 AM by SRamachandran Igib   [ updated Sep 21, 2015, 2:06 AM ]

गौरजा बनसल,  शोधार्थी.....

देल्ही बंगलोरे मुंबई, देश के हमारे महानगर कहलाते है,
                 कुछ दिन हम भी गुज़रे यहा, ऐसे सपने अक्सर हुमको आते है.
सपने को अपने साकार करने, हम भी निकल पड़े देल्ही शहेर की और,
                 इमारतें बड़ी-२ देखकर, आँखें हुमारी हो गयी भाव विभोर.
कुछ दिन बड़े चाव से हुमने, बहुत से माल में भ्रमण किया,
                  देल्ही मेट्रो रेल में बेड कर, हम ने भी देल्ही दर्शन किया.
विभिं प्रांतों के लोग यहा, १ ही मोहल्ले में रहते है,
                  दिलवालों की है ये देल्ही, गर्व से हुमेशा  ये कहते है.
थोड़े ही दिन में , असलियत बड़े शहरों की मेरे सामने आई,
                 बस चार दिन की थी ये चाँदनी, बात ये मेरी भी समझ में आई.
असली रूप महानगरों का, अधिकतम जनता के लिए कुछ और हैं,
                पीली चीज़ दूर से जो दिखाई दे, ज़रूरी तो नही हुमेसा वो गोल्ड है.
मेट्रो शहेर की भीड़ में, इंसान है खोता जा रहा,
                भागमभाग है इतनी यहाँ, जीना जीवन १ कला है,
इस बात को ही है, भूलता जा रहा|
हर सुबह मेट्रो की पीली लाइन से आना, १ प्रॉजेक्ट सा लगता है,
                जाम में घंटों फास्कार ऑफीस आना, अब रोज़ का काम लगता है.
घर आजकल मुझको आपना सराय जैसा लगता है,
                 आधा वक़्त तो अक्सर मेरा, सड़को पर ही गुज़रता है.
सुहाने बारिश के मौसम में, लोग यहा दर जाते है,
                चाई पकोडे खाने की जगह, जाम में फिर से फसेंगे,
इस बात को सोचकर घबराते है.
सितारे यहा के आसमान में, प्रदूषण से चुप जाते है,
                फ्रेश हवा में ऑक्सिजन पाने, लोग ऋषिकेश के चाकर लगाते हैं.
मा बाप यहाँ बच्चों से ढंग से, वीकेंड पर ही मिल पाते है.
                नाश्ता डाइनिंग टेबल पर नही, वो कारो में करते नज़र आते है.
स्ट्रेस डिप्रेशन के अधिकतम किससे, महानगरों से ही आते है,
                मदिरपान, धूम्रपान, यहाँ, स्ट्रेस बसटर कहलाते है.
भरे पूरे परिवार यहा, रोड रेज का शिकार बन जाते है,
               बलात्कार, शोषण के किससे से, अख़बार के पन्ने रोज़ भरे आते है.
मकान के किराए, बिजली पानी के बिल में ही,
             सारी तनख़्वाह चली जाती है, बचाया हर महीने में कितना,
हर महीने ये पहेली , पहेली ही रह जाती है.
 सड़कों की भीड़ देखकर, अब मुझको दर लगता हैं,
              फिर से अपने शहेर मे, बिंदास घूमने का मॅन करता है.
डरता हूँ इस दो ड्ड भाग मे, कही ना मैं भी गुम हो जाउन,
             नौकरी का अगर सवाल ना हो तो, आज ही अपने घर को जाउन.
काश, बहुराष्ट्रियाँ कपमनियाँ, छोटे शहरों में भी खुल जाए,
             मेरे जैसे लाखों लोगो के कदम, फिर से अपने नगरों को बढ़ जाएँ...

The 10 Commandments

posted Sep 18, 2015, 2:05 AM by SRamachandran Igib   [ updated Sep 18, 2015, 5:05 AM ]

Shrey Gandhi, Research Scholar.....
PHd is a journey which is taken by a brave few, If you haven't started yet then below is your cue.



1. Thou shall select a research topic where thy interest lies,
No matter what you do it eventually dies.
2. Thou shall carefully select a guide,
Cause when Hulk gets angry all you can do is hide.
3. Thou shall not waste time cause it always flies,
The lows are always followed by the highs.
4. Thou shall not love or date,
Cause everything else can wait.
5. Thou shall marry ones thesis,
Cause work never ends or ceases.
6. Thou shall never worry what thy results are,
Find the hidden sense, no matter how bizzare.
7. Thou shall worry about what thy future has,
A peons job is always up for grabs.
8. Thou shall never do plagiarism,
It will be treated at par with terrorism.
9. Thou shall always struggle with finance,
Getting your stipends at time will always be a nuisance.
10. Thou shall treat lab assistants as thy best friend,
They are the only ones who might lend you a helping hand.



Now then one might argue which job is ideal, Well then leap in if your tendencies are suicidal.



Shrey Gandhi, interested in computational biology and bioinformatics

दबंग

posted Sep 16, 2015, 2:55 AM by Vinod Scaria   [ updated Sep 17, 2015, 3:06 AM by SRamachandran Igib ]

अभय शर्मा, वैज्ञानिक.....


बेसिक और अप्लाईड, एक ही सिक्के के ये दो पहलू हैं
आइंस्टाइन और एडिसन, अलग अलग ये सिर्फ़ नाम हैं
हम भी कुछ ऐसा करें , समाज के ये पैगाम हैं
उलझ कर कहीं ना हम रह जाएँ कहीं, अभी करने को बहुत काम हैं

अर्जुन की तरह निशाना लगाना होगा,
अंधाधुंध तीर चलाने से खुद को बचाना होगा
लगेगी मछली की आँख में तभी तीर ,
जब हम होंगे गंभीर

मुश्किल इस बात से नहीं
की बेसिक अच्छा या अप्लाईड सही,

मुश्किल इस बात से है,
की ओरिजेनालिटि या इन्नोवेशन की अभी बहुत प्यास है

इस प्यास को बुझाएँ हम, नया विज्ञान करके दिखाएँ हम
या फिर
विज्ञान को लोगों के बीच लाएँ हम, डिस्कवरी करने का कुछ हम करें दम
या फिर

इन्वेन्शन करने का कुछ हम भरें दंभ, विज्ञान बने हमारे देश का स्तम्भ

और बने हम विज्ञान में दबंग

Abhay Sharma is interested in applying systems biology approach in neuropsychiatric drug discovery using Drosophila as model system

संकीर्ण मानसिकता

posted Sep 16, 2015, 2:54 AM by Vinod Scaria   [ updated Sep 17, 2015, 2:28 AM by SRamachandran Igib ]

भारत रत्‍न गुप्ता, वारि. तकनीकी अधिकारी.....

 

बहुत सारे माटी के दियों को देखते ही सुमन पति पर बरस पड़ीदीपावली में वैसे ही मुझे घर के काम से फुर्सत नहीं है और ऊपर से ये ढेर सारे दिये उठा लाए। अपनी इस संकीर्ण मानसिकता को त्याग दो कि ज्यादा दीपक जलाने से ज्यादा लक्ष्मी आएगी। अरेजितना किस्मत में होगा उतना ही मिलेगा। मैं आखिर कब तक मरती रहूँ?

इसपर पति ने बड़े ही शांत लहजे में उत्तर देते हुए कहाअरी भाग्यवान! क्यों बेवजह ही चीख रही हो। तुम्हारी जितनी इच्छा हो उतने ही दीपक लगानाजला लेना। मैं तो दीपक इसलिए ख़रीद लाया कि दीपक बेचने वाले के घर में आज दीपावली के दिन ज्यादा नहीं तो कम से कम दो दीपक तो जलें।

पति के मुख से निकले शब्दों को सुन सुमन को लगा कि उसके द्वारा अभी-अभी पति के लिए प्रयुक्त संकीर्ण मानसिकता शब्द अनायास ही व्यापक मानसिकता में तब्दील हो गया है। वह गुस्सा भूल कर उन माटी के दीयों को सहेजकर सुरक्षित स्थान पर रखने लगी।

मैं भारत रत्न गुप्ता जनवरी 1981 से सीएसआईआर की सेवा में हूं एवं जनवरी 2001 से वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी के पद पर कार्यरत हूं। हिन्दी भाषा से मेरा काफी लगाव है। मैने 2004 में एमएससी (कम्प्यूटर साइंस) की परीक्षा पास की है। आजकल मैं मानव संसाधन प्रभाग में संस्थान की सेवा में हूं।



काश, मैं सूरज होता !

posted Sep 16, 2015, 2:53 AM by Vinod Scaria   [ updated Sep 18, 2015, 5:08 AM by SRamachandran Igib ]

अमितेश आनन्द, शोधार्थी.....


काश, मैं सूरज होता !
तेरी हर अँधेरी रात को चीर, प्यारी सुबह लाता, 
तुम्हारी अलसाई आँखों को बड़े प्यार से खोलता । 
सुबह जब तुम अंगड़ाई लेते,
अपनी रौशनी के खजाने को तेरे आँचल में लुटा देता । 
ठंढी सुबह में, तुम्हारी हथेलियों को
अपने किरणों से सहलाता । 
तुम्हारी ज़िन्दगी के हर पन्ने को
अपनी इंद्रधनुषी रंगों से सजाता ।


काश, मैं सूरज होता !
चाहे तुम कहीं भी होते, तुम्हे अपने सामने पाता । 
बिना कुछ कहे अपने प्यार की तपिश तुम तक पहुँचा देता । 
जब तुम गुस्सा होते, मैं खुद को बादलों में छुपा लेता,
और बादलों के झरोखे से बातें कर तुम्हे मना लेता । 
जब सामने ना होता, चाँद के हाथों अपनी मद्धम रौशनी 
तुम तक भेजता । 
काश, मैं सूरज होता !


ना मन में कोई द्वेष, ना हृदय में कोई क्लेश।    मेरा ना कोई देश,मेरा ना कोई भेष।   सोच का एक पर्याय, नाम अमितेश।

The Brain

posted Sep 16, 2015, 2:53 AM by Vinod Scaria   [ updated Sep 18, 2015, 2:20 AM by SRamachandran Igib ]

Hiya Chowdhury.....


I was walking along a road  
When I saw a ball of pinkish brown   
He introduced himself as the BRAIN   
The smartest thinking cap in town!


He told me about himself
He said even I have one
He told me he was extremely lightweight
And didn’t make my head weigh a tonne!


I asked him if he gets lonely
But he said, “No, not at all!”
He said he has friends inside him
And never apart did they fall.



Their names are left half and right half
They “talk” to each other very well
And if they failed to do so,
It would be their fault if I fell.



He has lobes in him making up the cerebrum
Add-ons are cerebellum and brain-stem
I would be extraordinary indeed, he said
If I manage to stay alive without them.


The frontal lobe helps in reasoning and planning
While the parietal senses taste and pain
Temporal for speech and occipital for information
These are some of the parts of a brain.


Then comes the cerebellum, he said
Which coordinates the muscles of mine
This is what helps violinists play a piece
And keeps the conductor of an orchestra on time.


Last but not the least comes the brain-stem
Its main job is to keep me alive
This part controls breathing and heartbeat
And prevents me from dying when I decide to take a dive.


“But I am not just the sum of my parts,” he said
“Because I am a much much more
I am what makes you love your mother
And the reason why fights make you sore.”


“All emotions come packed with me
And urges like thirst and hunger
Positive feelings like being happy
Or negative ones like anger.”


“I am why reading history makes you bored
And athletics makes you go jumpy
Why pizza makes your mouth water
And homework makes you grumpy.”


“But I am thoughtful and don’t need a thank you
For all this information that I lent”
And whistling in a very melodious tune
Far and away he went.

(Originally published in Springline, 2015)

Hiya Chowdhury is a student of Class VIII at Springdales School Pusa Road, New Delhi. She loves to write and read, sing and listen to music and playing football. That is, when she gets free time after homework!

Chitra Latka has this to say .....

posted Sep 16, 2015, 2:52 AM by Vinod Scaria   [ updated Sep 17, 2015, 5:47 AM by SRamachandran Igib ]



Chitra Latka, Research Scholar, CSIR-IGIB

1-9 of 9

Comments